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Wednesday, August 10, 2016

*तू क्यों परेशान है*

खुदा तो रिज़क देता है
               कीड़ो को पत्थर में

तू क्यों परेशान है
               हीरे मोती के चक्कर में

उड़ जा आसमान में
               या लगा गोता समन्दर में

तुझे उतना ही मिलेगा
               जितना है तेरे मुकद्दर में

अपनी अंधेरी कब्र को
खुद ही रोशन करने की तय्यारी करले

ए इंसान

आज जिन्दो से कोई वफा नही करता
कल मुर्दो के लिए कोन दुआ करेगा

आईना कुछ ऐसा बना दे ""ए खुदा""

जो चेहरा नहीं नीयत दिखा दे

कदर करनी है
तो जीते जी करो

जनाजा उठाते वक्त तो
नफरत करने वाले भी रो पड़ते है

जिन आँखों को सजदे में
             रोने की आदत हो

वो आँखें कभी अपने
             मुक्कदर पर रोया नहीं करती.

कमाई तो जनाज़े के दिन पता चलेगी

दौलत तो कोई भी कमा लैता हे

ज़माना जब भी मुझे मुश्किल मे डाल देता है.
मेरा ख़ुदा हज़ार रास्ते निकाल देता है....

जमाना आज भी उसकी मिसाल देता है
नेकिया कर के जो दरिया में डाल देता है

अपनी भूख का इलज़ाम उस खुदा को ना दे
वो माँ के पेट में भी बच्चे को पाल देता हैं

Tuesday, July 19, 2016

*आज गुरु पुर्णिमा पर एक कविता*


वो कौन सा है पद ,
जिसे देता ये जहाँ सम्मान ।
वो कौन सा है पद ,
जो करता है देशों का निर्माण ।
वो कौन सा है पद ,
जो बनाता है इंसान को इंसान ।
वो कौन सा है पद ,
जिसे करते है सभी प्रणाम ।
वो कौन सा है पद ,
जिकसी छाया में मिलता ज्ञान ।
वो कौन सा है पद ,
जो कराये सही दिशा की पहचान ।
गुरू है इस पद का नाम ।
मेरा सभी गुरूजनो को शत-शत प्रणाम ।

Tuesday, July 5, 2016

*सातवें वेतन आयोग की सौगात- आ कविता एक वार जरूर वांचो*


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     सातवें वेतन आयोग की सौगात
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किसी को चुपड़ी चार मिली है
                   किसी को केवल भात मिली
सातवें वेतन की मोदी जी
                     ये   कैसी  सौगात  मिली

लम्बा अरसा बीत गया
                        इस वेतन की तैयारी में
जैसे कोई सजनी देख रही
                     साजन की बाट अटारी में
लेकिन जब साजन आये तो
                      आँखों  से  नीर बहाया है
ये कैसी वेतन वृद्धि है कोई
                   समझ  नहीं  कुछ  पाया  है
है यही तुम्हारे अच्छे दिन तो
                     इनको  वापिस  ले  जाओ
केवल इतिहास को दोहरा कर
                   बस  वेतन  वृद्धि  दे  जाओ
मन करता छोड़ नौकरी को
                     मैं भी अब चाय बनाऊँगा
फिर मोदी जी की तरह एक दिन
                        घूम  विदेश  में आऊँगा
चाँद पूर्णिमा का आया है
                  या  फिर  काली  रात  मिली
सातवें वेतन की मोदी जी
                       ये  कैसी  सौगात  मिली

अरुण जेटली जी तुमने ये
                     कैसा  नियम  निकाला  है
वेतन वृद्धि ही गलफांस बना
                    जैसे कोई विषधर काला है
सड़कों पर जाने को तुमने
                      अब कैसी ये मजबूरी की
वेतन वृद्धि दी सबको या
                         सबको बस मजदूरी दी
इतिहास को शर्मसार करके
               उन साठ साल को भुला दिया
मर भी न सकें जी भी न सकें
                इस मीठे जहर को पिला दिया
कोई चाहे कुछ भी बोले 
                     मेरे मन बस में एक पीड़ा है
ये वेतन वृद्धि नहीं ऊँट के
                         मुँह  में  थोड़ा  जीरा  है
विश्वास बहुत था लोगो पर
                        ये तो केवल घात मिली
सातवें वेतन की मोदी जी
                         ये  कैसी सौगात मिली

वेतन वृद्धि नहीं मिले बस
                       इतना काम करा दो तुम
आटे दाल  के भावों को बस
                        फिर से आधे ला दो तुम
हर कर्मचारी के बच्चों को
                 अच्छी शिक्षा दिलवा दो तुम
रहने को आवास सभी को
                   बिना शुल्क मिलवा दो तुम
रेलगाड़ी  के  डिब्बे  में
                  जनरल डिब्बे बढ़वा दो तुम
A C बस में सफर कर सके
                  मासिक  पास  बना  दो  तुम
इतने काम करा दो सबको
                        तब समझेंगे दिन अच्छे
कर्मचारी भी खुश होंगे
                    कहलाओ हितैषी तुम सच्चे
वादे पूरे कर तो या फिर
                        समझेंगे बस बात मिली
सातवें वेतन की मोदी जी
                       ये  कैसी  सौगात  मिली!!

Thursday, May 12, 2016

खुद से भी रूठूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं...!!

मै यादों का किस्सा खोलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
मै गुजरे पल को सोचूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.

अब जाने कौन सी नगरी में,
आबाद हैं जाकर मुद्दत से.
मै देर रात तक जागूँ तो ,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.

कुछ बातें थीं फूलों जैसी,
कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,
मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.

वो पल भर की नाराजगियाँ,
और मान भी जाना पलभर में,
अब खुद से भी रूठूँ तो,
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं...!!

Tuesday, May 10, 2016

यार से ऐसी यारी रख.

यार से ऐसी यारी रख
                दुःख में भागीदारी रख,
चाहे लोग कहें कुछ भी
                 तू तो जिम्मेदारी रख,
वक्त पड़े काम आने का
                 पहले अपनी बारी रख,
मुसीबतें तो आएगी
                 पूरी अब तैयारी रख,
कामयाबी मिले ना मिले
                जंग हौसलों की जारी रख,
बोझ लगेंगे सब हल्के
                मन को मत भारी रख,
मन जीता तो जग जीता
               कायम अपनी खुद्दारी रख ।