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Saturday, September 17, 2016

Jag mein sacho tero naam

Jag mein sacho tero naam,
Hey ram hey ram.

Tu hi mata, tu hi pita hai,
Tu hi to hai radha ka shayam,
Hey ram..

Tu hi bigade, tu hi savare,
Iss jag ke sare kaam,
Hey ram..

Tu antaryami sab ka swami,
Tere charno mein charo dhaam,
Hey ram..

Tu hi jagdata, vishwa vidhata,
Tu hi subah tu hi shaam,
Hey ram..

Wednesday, February 3, 2016

प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र।

🌅🔔🌿प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र। संग्रह

  🔹 प्रात: कर-दर्शनम्🔹

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥

         🔸पृथ्वी क्षमा प्रार्थना🔸

समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥

🔺त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण🔺

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

              ♥ स्नान मन्त्र ♥

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥

           🌞 सूर्यनमस्कार🌞

ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्
सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥

ॐ मित्राय नम:
ॐ रवये नम:
ॐ सूर्याय नम:
ॐ भानवे नम:
ॐ खगाय नम:
ॐ पूष्णे नम:
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:
ॐ मरीचये नम:
ॐ आदित्याय नम:
ॐ सवित्रे नम:
ॐ अर्काय नम:
ॐ भास्कराय नम:
ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥

                🔥दीप दर्शन🔥

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥

दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥

            🌷 गणपति स्तोत्र 🌷

गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥
विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।

विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेतसर्वविघ्नोपशान्तये॥

        ⚡आदिशक्ति वंदना ⚡

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

           🔴 शिव स्तुति 🔴

कर्पूर गौरम करुणावतारं,
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
सदा वसंतं हृदयार विन्दे,
भवं भवानी सहितं नमामि॥

              🔵 विष्णु स्तुति 🔵

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

            ⚫ श्री कृष्ण स्तुति ⚫

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌॥

            ⚪ श्रीराम वंदना ⚪

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

               ♦श्रीरामाष्टक♦

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥

    🔱 एक श्लोकी रामायण 🔱

आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥

           🍁सरस्वती वंदना🍁

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती
निःशेषजाड्याऽपहा॥

            🔔हनुमान वंदना🔔

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्‌।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्‌।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥

         🌹 स्वस्ति-वाचन 🌹

ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

            ❄ शांति पाठ ❄

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
🌅🌿🍁🌻🔔
🌾🌻🌹🍀🌄🌘🔔🌻

Tuesday, December 29, 2015

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं

!! ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् !!
*देवसंस्कृति की माता ... ' गायत्री '
गायत्री माता वेदमाता है ! सारे वेदों का जन्म गायत्री से ही हुआ है ! उसी ने सारी संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया ! अतः गायत्री माता वेदमाता बनी ! इसके बाद गायत्री माता देवमाता बनी ! हिंदुस्तान के निवासी देवता थे ! वे स्वयं तो कम खाते थे , पर दूसरों को अधिक खिलाते थे ! यहाँ के नागरिकों ने सारी दुनियाँ को अपनी संपदा बाँट दी , इसलिए वे देवमानव कहलाए ! अकेले खाते समय उन्हें मन में अप्रसन्नता होती और दूसरों को खिलाते समय वे प्रसन्न होते !
जब गायत्री हमारे ह्रदय में उदय होती है , तो हमारे जीवन को चमकाकर रख देती है ! वह हमारे विचारों में परिवर्तन कर देती है ! हमें केवल अपना परिवार ही नहीं , सारा समाज और देश दिखलाई पड़ता है और हम देवता बनते चले जाते हैं ! गायत्री माता हंस पर बैठकर कमंडल लेकर नहीं आती ! वह करुणा के रूप में , दया के रूप में हमारे अंदर आती है ! यही उसका स्वरुप है , जो हमें देवता बनाकर चला जाता है और हम देवता जैसा जीवन जीने लगते हैं ! गायत्री माता की कृपा से हम लोक-मंगल हेतु अपनी बुद्धि , धन और समय को लगाने लगते हैं ! हमारा जीवन धन्य हो जाता है !
सारे संसार में गायत्री मंत्र का विस्तार हो ! यह मात्र हिन्दुओं तक ही सीमित न रहे , यह ब्राह्मणों का ही न रह जाए , बल्कि विश्वमानव का मंत्र बने ! विश्वमाता से मतलब है की सारा विश्व एक नए आधार पर एक होने जा रहा है ! एक नई संस्कृति आ रही है ! एक नया सार्वभौम धर्म आ रहा है ! सारी दुनियाँ इस एक ही केंद्र के ऊपर इकट्ठी होने जा रही है ! हम सब एक आचारसंहिता और एक मातृभाव में बंधने जा रहे हैं ! गायत्री माता ईमानदारी , नेकनीयती , सज्जनता और शराफत की देवी है ! हंस इसका वाहन है ! गायत्री माता की स्थापना करके हम राजहंस पैदा करना चाहते हैं ! गायत्री उपासकों में राजहंस की वृति पैदा करना चाहते हैं !!
- वेदमूर्ति तपोनिष्ठ युगऋषि श्रीराम

Sunday, November 29, 2015

सज्जन व्यक्तियों

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन ,

दानेन पाणिर्न तु कंकणेन ,

विभाति कायः करुणापराणां ,

परोपकारैर्न तु चन्दनेन ||

अर्थात् :कानों की शोभा कुण्डलों से नहीं अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है | हाथ दान करने से सुशोभित होते हैं न कि कंकणों

से | दयालु / सज्जन व्यक्तियों का शरीर चन्दन से नहीं बल्कि दूसरों का हित करने से शोभा पाता है |