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Sunday, January 29, 2017

मैया तेरे चरणों की, रज धूल जो मिल जाए

💞मैया तेरे चरणों की, रज धूल जो मिल जाए
सच कहती हूँ मेरी, तकदीर बदल जाए
मैया तेरे चरणों की....

सुनते है तेरी रहमत, दिन रात बरसती है-२
एक बूँद जो मिल जाए, मन की कली खिल जाए
मैया तेरे चरणों की....

💞 ये मन बड़ा चंचल है, कैसे तेरा भजन करूँ
जितना इसे समझाउँ, उतना ही मचलता है
मैया तेरे चरणों की....

💞नज़रों से गिराना ना, चाहे जितनी सज़ा देना
नज़रों से जो गिर जाए, मुश्किल ही सम्भल पाए
मैया तेरे चरणों की....

💞 मैया इस जीवन में, बस एक तमन्ना है
तुम सामने हो मेरे, मेरा दम ही निकल जाए
मैया तेरे चरणों की....

Wednesday, November 16, 2016

*पहली बार किसी कविता को पढ़कर आंसू आ गए ।*

*पहली बार किसी कविता को पढ़कर आंसू आ गए ।*😔😔

*दुध पिलाया जिसने छाती से निचोड़कर*
*मैं* *"निकम्मा, कभी 1 ग्लास पानी पिला न सका ।* 😭

*बुढापे का "सहारा,, हूँ* *"अहसास" दिला न सका*
*पेट पर सुलाने वाली को* *"मखमल,* *पर सुला न सका ।* 😭

*वो "भूखी, सो गई "बहू, के "डर, से एकबार मांगकर*
*मैं "सुकुन,, के "दो, निवाले उसे खिला न सका ।*😭

*नजरें उन "बुढी, "आंखों से कभी मिला न सका ।*
*वो "दर्द, सहती रही में खटिया पर तिलमिला न सका ।* 😔

*जो हर "जीवनभर" "ममता, के रंग पहनाती रही मुझे*
*उसे "दिवाली  पर दो "जोड़ी, कपडे सिला न सका ।* *😭*

*"बिमार बिस्तर से उसे "शिफा, दिला न सका ।*
*"खर्च के डर से उसे बड़े* *अस्पताल, ले जा न सका ।* 😔

*"माँ" के बेटा कहकर "दम,तौडने बाद से अब तक सोच रहा हूँ*,
*"दवाई, इतनी भी "महंगी,, न थी के मैं ला ना सका* । 😭

*माँ तो माँ होती हे भाईयों माँ अगर कभी गुस्से मे गाली भी दे तो उसे उसका "Duaa"* *समझकर भूला देना चाहिए*|✨,, ✨

*मैं  यह वादा करता  अगर यह पोस्ट आप दस ग्रुप मे भेजोगे तो कम से कम दो लड़के ईस पोस्ट को पढ कर अपनी माँ के बारे मे सोचेंगे जरुर!!!!!!!!* 😔

Saturday, April 30, 2016

माँ अगर कभी गुस्से मे गाली भी दे तो उसे उसका आशी्रवाद समझकर भूला देना चाहिए

पहली बार किसी गज़ल को पढ़कर आंसू आ गए ।
,
शख्सियत, ए 'लख्ते-जिगर, कहला न सका ।
जन्नत,, के धनी "पैर,, कभी सहला न सका ।
.
दुध, पिलाया उसने छाती से निचोड़कर,
मैं 'निकम्मा, कभी 1 ग्लास पानी पिला न सका ।
.
बुढापे का "सहारा,, हूँ 'अहसास' दिला न सका
पेट पर सुलाने वाली को 'मखमल, पर सुला न सका ।
.
वो 'भूखी, सो गई 'बहू, के 'डर, से एकबार मांगकर,
मैं "सुकुन,, के 'दो, निवाले उसे खिला न सका ।
.
नजरें उन 'बुढी, "आंखों,, से कभी मिला न सका ।
वो 'दर्द, सहती रही में खटिया पर तिलमिला न सका ।
.
जो हर "जीवनभर" 'ममता, के रंग पहनाती रही मुझे,
उसे "त्यौहार" पर दो 'जोडे़, कपडे सिला न सका ।
.
"बिमार बिस्तर से उसे 'शिफा, दिला न सका ।
'खर्च के डर से उसे बडे़ अस्पताल, ले जा न सका ।
.
"माँ" के बेटा कहकर 'दम, तौडने बाद से अब तक सोच रहा हूँ,
'दवाई, इतनी भी "महंगी,, न थी के मैं ला ना सका ।

माँ तो माँ होती है ...
भाईयों माँ अगर कभी गुस्से मे गाली भी दे
तो उसे उसका आशी्रवाद समझकर भूला देना चाहिए|✨,, ✨

Friday, February 26, 2016

माँ की इच्छा

✒🔴 शरीर में रौंगटे खड़े कर देने वाली कविता,,,

    🔴🎷 🌺  माँ की इच्छा  🌺 🎷🔵

   महीने बीत जाते हैं ,
   साल गुजर जाता है ,
   वृद्धाश्रम की सीढ़ियों पर ,
   मैं तेरी राह देखती हूँ।

                   आँचल भीग जाता है ,
                   मन खाली खाली रहता है ,
                   तू कभी नहीं आता ,
                   तेरा मनि आर्डर आता है।

                               इस बार पैसे न भेज ,
                               तू खुद आ जा ,
                               बेटा मुझे अपने साथ ,
                               अपने 🏡 घर लेकर जा।

    तेरे पापा थे जब तक ,
    समय ठीक रहा कटते ,
    खुली आँखों से चले गए ,
    तुझे याद करते करते।

               अंत तक तुझको हर दिन ,
               बढ़िया बेटा कहते थे ,
               तेरे साहबपन का ,
               गुमान बहुत वो करते थे।

                            मेरे ह्रदय में अपनी फोटो ,
                            आकर तू देख जा ,
                            बेटा मुझे अपने साथ ,
                            अपने 🏡 घर लेकर जा।

   अकाल के समय ,
   जन्म तेरा हुआ था ,
   तेरे दूध के लिए ,
   हमने चाय पीना छोड़ा था।

               वर्षों तक एक कपडे को ,
               धो धो कर पहना हमने ,
               पापा ने चिथड़े पहने ,
               पर तुझे स्कूल भेजा हमने।

                         चाहे तो ये सारी बातें ,
                         आसानी से तू भूल जा ,
                         बेटा मुझे अपने साथ ,
                         अपने 🏡 घर लेकर जा।

🏡 घर के बर्तन मैं माँजूंगी ,
      झाडू पोछा मैं करूंगी ,
      खाना दोनों वक्त का ,
      सबके लिए बना दूँगी।

            नाती नातिन की देखभाल ,
            अच्छी तरह करूंगी मैं ,
            घबरा मत, उनकी दादी हूँ ,
            ऐंसा नहीं कहूँगी मैं।

                            तेरे 🏡 घर की नौकरानी ,
                            ही समझ मुझे ले जा ,
                            बेटा मुझे अपने साथ ,
                            अपने 🏡 घर लेकर जा।

   आँखें मेरी थक गईं ,
   प्राण अधर में अटका है ,
   तेरे बिना जीवन जीना ,
   अब मुश्किल लगता है।

                 कैसे मैं तुझे भुला दूँ ,
                 तुझसे तो मैं माँ हुई ,
                 बता ऐ मेरे कुलभूषण ,
                 अनाथ मैं कैसे हुई ?

                           अब आ जा तू मेरी कब्र पर ,
                           एक बार तो माँ कह जा ,
                           हो सके तो जाते जाते ,
                           वृद्धाश्रम गिराता जा।

🌹 शायद आपकी कोशिश से कोई " माँ " अपने 🏡 घर चली जाये ....

   

Friday, January 29, 2016

अब आ जा तू मेरी कब्र पर एक बार तो माँ कह जा

राज्यस्तरीय काव्यस्पर्धा में  प्रथम क्रमांक प्राप्त मराठी कविता का हिंदी रूपांतर )

" शरीर में रौंगटे खड़े कर देने वाली कविता "

🌺"माँ की इच्छा"🌺

महीने बीत जाते हैं
साल गुजर जाता है
वृद्धाश्रम की सीढ़ियों पर
मैं तेरी राह देखती हूँ।

              आँचल भीग जाता है
              मन खाली खाली रहता है
              तू कभी नहीं आता
              तेरा मनि आर्डर आता है।

इस बार पैसे न भेज
तू खुद आ जा
बेटा मुझे अपने साथ
अपने घर लेकर जा।

            तेरे पापा थे जबतक
            समय ठीक रहा कटते
            खुली आँखों से चले गए
            तुझे याद करते करते।
           
अंत तक तुझको हर दिन
बढ़िया बेटा कहते थे
तेरे साहबपन का
गुमान बहुत वो करते थे।

         मेरे ह्रदय में अपनी फोटो
         आकर तू देख जा
         बेटा मुझे अपने साथ
         अपने घर लेकर जा।

अकाल के समय
जन्म तेरा हुआ था
तेरे दूध के लिए
हमने चाय पीना छोड़ा था।

        वर्षों तक एक कपडे को
        धो धो कर पहना हमने
        पापा ने चिथड़े पहने
        पर तुझे स्कूल भेजा हमने।

चाहे तो ये सारी बातें
आसानी से तू भूल जा
बेटा मुझे अपने साथ
अपने घर लेकर जा।

         घर के बर्तन मैं माँजूंगी
         झाडू पोछा मैं करूंगी
         खाना दोनों वक्त का
         सबके लिए बना दूँगी।

नाती नातिन की देखभाल
अच्छी तरह करूंगी मैं
घबरा मत, उनकी दादी हूँ
ऐंसा नहीं कहूँगी मैं।

          तेरे घर की नौकरानी
          ही समझ मुझे ले जा
          बेटा मुझे अपने साथ
          अपने घर लेकर जा।

आँखें मेरी थक गईं
प्राण अधर में अटका है
तेरे बिना जीवन जीना
अब मुश्किल लगता है।

            कैसे मैं तुझे भुला दूँ
            तुझसे तो मैं माँ हुई
            बता ऐ मेरे कुलभूषण
            अनाथ मैं कैसे हुई ?

अब आ जा तू मेरी कब्र पर
एक बार तो माँ कह जा
हो सके तो जाते जाते
वृद्धाश्रम गिराता जा।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Tuesday, January 19, 2016

माँ बहुत झूठ बोलती है.........

...........माँ बहुत झूठ बोलती है............

सुबह जल्दी जगाने, सात बजे को आठ कहती है।
नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है।
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती है।
छोटी छोटी परेशानियों का बड़ा बवंडर करती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

थाल भर खिलाकर, तेरी भूख मर गयी कहती है।
जो मैं न रहूँ घर पे तो, मेरी पसंद की
कोई चीज़ रसोई में उससे नहीं पकती है।
मेरे मोटापे को भी, कमजोरी की सूज़न बोलती है।
.........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए, बोल कर,
मेरे साथ दस लोगों का खाना रख देती है।
कुछ नहीं-कुछ नहीं बोल, नजर बचा बैग में,
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है।
.........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

टोका टाकी से जो मैं झुँझला जाऊँ कभी तो,
समझदार हो, अब न कुछ बोलूँगी मैं,
ऐंसा अक्सर बोलकर वो रूठती है।
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती होती है।
.........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाऊँगी,
सारी फ़िल्में तो टी वी पे आ जाती हैं,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है,
बहानों से अपने पर होने वाले खर्च टालती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

मेरी उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ा कर बताती है।
सारी खामियों को सब से छिपा लिया करती है।
उसके व्रत, नारियल, धागे, फेरे, सब मेरे नाम,
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

भूल भी जाऊँ दुनिया भर के कामों में उलझ,
उसकी दुनिया में वो मुझे कब भूलती है।
मुझ सा सुंदर उसे दुनिया में ना कोई दिखे,
मेरी चिंता में अपने सुख भी किनारे कर देती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

मन सागर मेरा हो जाए खाली, ऐंसी वो गागर,
जब भी पूछो, अपनी तबियत हरी बोलती है।
उसके "जाये " हैं,  हम भी रग रग जानते हैं।
दुनियादारी में नासमझ, वो भला कहाँ समझती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

उसके फैलाए सामानों में से जो एक उठा लूँ
खुश होती जैसे, खुद पर उपकार समझती है।
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे उदास होकर,
सोच सोच अपनी तबियत खराब करती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

" 🙏हर माँ को समर्पित🙏 "

Saturday, January 16, 2016

मा कविता

कहाँ जा रही हो छोड़ कर राह मेँ मुझ इस तरह
अभी तक तो मैँने चलना भी नहीँ
सीखा
अरे मुरझाया हुआ फूल हूँ मैँ तो
अभी तक तो मैँने खिलना भी सीखा
नहीँ
खेल खेल मेँ गिर जाऊँ तो कौन सहारा देगा मुझे
मैँने तो अभी उछलना भी सीखा
नहीँ
चल दी हो तुम कहाँ अकेला कर के मुझे
घर से अकेले अभी तक निकलना भी सीखा
नहीँ
कौन पौँछेगा मेरे आँसू जब भी तेरी याद मेँ रोया तो
अभी तक तो मैँन सम्भलना भी सीखा
नहीँ
देखा कौन अपने आँचल की छाँव इस तपती धूप मेँ तेरे
सिवा
अभी तक मेँ मैँने जलना भी सीखा
नहीँ, मा